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बिलाड़ा विधानसभा क्षेत्र: इस बार नए चेहरों पर दाव खेल सकते है कांग्रेस व भाजपा

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जोधपुर. जोधपुर जिले के बिलाड़ा विधानसभा क्षेत्र अपने अनूठे जातीय समीकरण के कारण हमेशा सुर्खियों में रहता आया है। वर्ष 1951 से लेकर अब तक हुए 14 चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस ने नौ बार तो भाजपा ने तीन बार जीत हासिल की। वहीं दो बार निर्दलीय तो एक बार जनता दल ने बाजी मारी। कहने को तो यह जाट बाहुल्य मानी जाती है, लेकिन अन्य जातियों की हार-जीत में अहम भूमिका रहती आई है। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद अनुसूचित जातिके लिए आरक्षित इस सीट के सारे समीकरण अब बदले हुए है। बदले हालात में हुए तीन चुनाव में दो बार भाजपा तो एक बार कांग्रेस ने बाजी मारी। इस बार के चुनाव में कांग्रेस व भाजपा की तरफ से नए चेहरे मैदान में उतारे जा सकते है।
ये है जातीय समीकरण
दो नगर पालिका बिलाड़ा व पीपाड़ शहर की इस सीट पर कुल 2.65 लाख मतदाता है। बिलाड़ा पंचायत समिति के संपूर्ण क्षेत्र के अलावा इसमें पीपाड़ की अधिकांश पंचायतें इसमें शामिल है। इसके अलावा लूणी की 13 व मंडोर की 7 पंचायतें इसका हिस्सा है। इनमें से जाट सबसे अधिक करीब 45 हजार तो मेघवाल मतदाता करीब 42 हजार है। इसके अलावा मुस्लिम 25 हजार, राजपूत 20 हजार, सीरवी 18 हजार, माली 18 हजार, विश्नोई 15 हजार, बावरी 14 हजार के अलावा अन्य जातियों के मतदाता है।(नोट: जातीय मतदाताओं की यह संख्या अनुमानित है)
डूडी व चौधरी के नाम तीन-तीन जीत
वर्ष 1951 से 1967 तक और फिर 1977 से 2003 के चुनाव तक यह सीट सामान्य वर्ग के लिए रही है। कभी परसराम मदेरणा के विश्वस्त माने जाने वाले और वर्तमान में भाजपा नेता रामनारायण डूडी बिलाड़ा से तीन बार विधायक चुने जा चुके है। वर्ष 1977 व 1980 में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में तो वर्ष 2003 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की। वहीं कभी गहलोत के खास माने जाने वाले राजेन्द्र चौधरी ने वर्ष 1985 में यहां से चुनाव राजनीति का सफर शुरू किया और जीत हासिल की। इसके बाद वर्ष 1993 व 1998 में भी चौधरी यहां से विधायक चुने गए। जबकि कांग्रेस के कालूराम आर्य व भाजपा के अर्जुनलाल यहां से दो-दो बार विधायक चुने जा चुके है।
परिसीमन के बाद यहां की राजनीति बदली
वर्ष 2008 में हुए परिसीमन के बाद बिलाड़ा का राजनीति पूरी तरह से बदल गई। तीन-तीन बार विधायक रह चुके डूडी व चौधरी नया क्षेत्र नहीं तलाश पाए। हालांकि डूडी को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा। जबकि चौधरी के हाथ खाली ही रहे। बाद में चौधरी की गहलोत से राजनीतिक दूरियां बढ़ती चली गई। अब वे गहलोत केधुर विरोधी माने जाने वाले सचिन पायलट के करीबी माने जाते है।
सामने आ सकते है नए चेहरे
बिलाड़ा में इस बार भाजपा व कांग्रेस में नए चेहरों पर दांव खेलने पर मंथन चल रहा है। दोनों ही दल रिटायर्ड अधिकारियों को मौका दे सकते है। अर्जुनलाल बढ़ती उम्र के कारण रेस से बाहर हो सकते है। वहीं वर्तमान विधायक हीराराम का पार्टी के भीतर ही काफी विरोध है। ऐसे में दोनों प्रमुख दल नए चेहरों के साथ मैदान में उतरेंगे।
गत चुनाव में हुआ ता त्रिकोणीय मुकाबला
वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 2013 में हार चुके हीराराम मेघवाल तोभाजपा ने एक बारफिर अजुर्नलाल गर्ग पर विश्वास जताया। वहीं कांग्रेस से दावेदारी जताने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी विजेन्द्र झाला टिकट नहीं मिलने पर आरएलपी प्रत्याशी के रूप में आ डटे। त्रिकोणीय मुकाबले में हीराराम ने जीत हासिल की। इस बार भी यहां त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलने की पूरी उम्मीद है।
बिलाड़ा विधानसभा सीट का इतिहास
पहला चुनाव वर्ष 1951: संतोष सिंह- निर्दलीय
वर्ष 1957- भैरोसिंह- कांग्रेस
वर्ष 1962- चंदरसिंह- निर्दलीय
वर्ष 1967- कालूराम आर्य
वर्ष 1972-कालूराम आर्य
वर्ष 1977- रामनारायण डूडी- कांग्रेस
वर्ष 1980- रामनारायण डूडी- कांग्रेस
वर्ष 1985- राजेन्द्र चौधरी- कांग्रेस
वर्ष 1990- मिश्रीलाल चौधरी- जनता दल
वर्ष 1993- राजेन्द्र चौधरी- कांग्रेस
वर्ष 1998- राजेन्द्र चौधरी- कांग्रेस
वर्ष 2003- रामनारायण डूडी- ङाजपा
वर्ष 2008- अर्जुनलाल गर्ग- भाजपा
वर्ष 2013- अर्जुनलाल गर्ग- भाजपा
वर्ष 2018- हीराराम मेघवाल- कांग्रेस

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