हिंदी में कहीं छुपकर बैठी है संस्कृत

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राहुल पाण्डेय
संस्कृत की जो हालत है वह ये कि कोई अगर संस्कृत में बोलता मिल जाए तो उसकी खबर बन जाती है कि फलां ने तो संस्कृत बोली। मैं यह तो नहीं कहता कि संस्कृत एक मृत भाषा है क्योंकि भाषाएं कभी मरा नहीं करतीं, बस उनका स्वरूप बदल जाता है। शब्द जिंदा रहते हैं क्योंकि उन्हें पहले भी झूठ बोलना था, अब भी बोलना रहता है। इसलिए संस्कृत मरी तो बिलकुल नहीं है, अलबत्ता हिंदी में जहां-तहां छुपी बैठी रहती है और मौके-बेमौके सामने भी आती रहती है लेकिन इतना जरूर है कि इस भाषा में आसान रोजगार मिलना बेहद कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी है।

लेकिन शायद यह बात आईआईएमसी को समझ में नहीं आ रही है। पत्रकारों की दुनिया में पहले से ही बेरोजगारी ने सबका दम निकाल रखा है। जो हैं, उनसे कभी बात करके देखिए, हमेशा अपनी नौकरी खतरे में बताते हैं। जो नए लोग हैं, उन्हें आसानी से काम नहीं मिलता। कैंपस सेलेक्शन भी ऊपर के नए बच्चों को चुनकर कैंपस से ऐसे चुपचाप किनारे हो लेता है कि दिखा तो बच्चे कहीं उसे घेरकर यह न पूछ लें कि उसे ही क्यों नौकरी दी? हमें क्यों न दी? देश में रोजगारों की हालत पहले से ही खस्ता है। पीएचडी करके लोग चपरासी के पद पर अप्लाई कर रहे हैं तो इंजिनियरिंग करके बच्चे समोसा बेच रहे हैं। समोसा बेचना कोई खराब काम नहीं है, जो भी अच्छा समोसा बनाकर बेचता है, किसी और का पाए न पाए, दिल से मेरा आशीर्वाद जरूर पाता है लेकिन उसकी इंजिनियरिंग समोसे के किसी काम की नहीं। देश के काम की जरूर हो सकती है, लेकिन फिलहाल तो देश के बस का नहीं कि उससे काम ले सके, अलबत्ता समोसा जरूर ले लेता है। ऐसा ही देश है मेरा।
बहरहाल, पत्रकार बनाने वाला संस्थान आईआईएमसी संस्कृत पत्रकारिता का कोर्स शुरू करने जा रहा है। पिछले हफ्ते ही अखबारों में इसकी सूचना भी छपी थी जिसमें संस्थान के मुखिया अपने प्रसन्न चेहरे की तस्वीर के साथ बता रहे थे कि संस्कृत में वह पत्रकार तैयार करेंगे। अलबत्ता ये पत्रकार किस अखबार में काम करेंगे, किस चैनल के रनडाउन पर बैठेंगे, किसके लिए लाइव करेंगे, किस वेबसाइट के इंडेक्स पेज को संस्कृति से भरेंगे, इन सवालों का जवाब उनके पास तो नहीं है, हो सकता है कि कोई ठोस प्रोग्राम बनाकर बैठे हों।
मुझे लगता है कि आईआईएमसी पर हवा का असर है। मैं अंधविश्वासी नहीं हूं, फिर भी कुछ हवाएं होती हैं जो बगैर दिखे असर कर ही जाती हैं। पिछले तीन सालों में मैंने अपने कई परिचितों पर इस हवा का असर होते देखा है। ऐसे में मुझे इस खबर से बिल्कुल भी ताज्जुब नहीं हुआ क्योंकि मुझे ये भी पूरी तरह से हवा का ही असर दिख रहा है। फिर भी, मेरे लिए जो बात जानने वाली है, वह ये कि कहीं आईआईएमसी प्रमुख संस्कृत में अपनी या जिनकी हवा है, उनकी जीवनी तो नहीं लिख रहे? वह तो लिखकर अपना जीवन बना ही लेंगे, मुझे तो बस उन बच्चों की चिंता हो रही है जो आईआईएमसी से संस्कृत पत्रकारिता पढ़कर निकलने वाले हैं। बेचारों ने अगर समोसा ही संस्कृत में बेचना शुरू किया तो लेने की बात तो बाद में, समझेगा कौन कि समोसे को संस्कृत में कहा क्या?
डिसक्लेमर: ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं