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ओसियां विस: राजपूत समाज की बैठक, सर्वसम्मति से हर हाल में भाजपा के साथ रहने का निर्णय

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– त्रिकोणीय संघर्ष की संभावनाओं पर फिलहाल लगा विराम, आरएलपी अब तक मौन

जोधपुर। जिले की ओसियां विधानसभा क्षेत्र के राजपूत समाज की बैठक रविवार को ओसियां में हुई। इसमें राजपूत समाज ने सर्वसम्मति से हर हाल में बीजेपी के साथ ही रहने का निर्णय लेते हुए भाजपा उम्मीदवार भैराराम सियोल को मत व समर्थन देने की घोषणा की। इसके साथ ही पिछले कई दिनों से निर्दलीय राजपूत कैंडिडेट खड़ा करने की चर्चाओं पर भी पूर्णतया विराम लगा दिया।

गौरतलब है कि ओसियां विधानसभा से बीजेपी के वरिष्ठ नेता व दो बार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सामने बीजेपी के उम्मीदवार रहे शम्भूसिंह खेतासर और महेंद्रसिंह भाटी उम्मेदनगर टिकट मांग रहे थे। खेतासर ने 2008 में यहीं से निर्दलीय चुनाव लड़कर बीजेपी को नम्बर 3 पर धकेल दिया था, वहीं भाटी ने 2018 में निर्दलीय ताल ठोककर 40 हजार मत हासिल किए, जो भाजपा की हार का कारण बने थे। तब हुए त्रिकोणीय मुकाबले में ये सीट कॉंग्रेस की दिव्या मदेरणा ने जीती थी।

जिले में ओसियां ही एक मात्र जाट सीट होने के चलते पूर्व विधायक भैराराम सियोल को बीजेपी ने टिकट दिया। इसके साथ ही इस क्षेत्र में त्रिकोणीय संघर्ष के आसार नजर आने लगे थे। सोमवार को राजपूत समाज की बैठक में बीजेपी उम्मीदवार भैराराम सियोल ने राजपूत समाज से मार्मिक अपील कर साथ मांगा, तो शम्भूसिंह खेतासर और महेंद्रसिंह उम्मेदनगर ने भी समाज से सियोल के साथ खड़े होने की अपील की। इस दौरान बैठक में उपस्थित राजपूत समाज के गणमान्य नागरिकों ने एक स्वर में भाजपा उम्मीदवार सियोल के साथ खड़े रहने का निर्णय किया। इस दौरान महाराज गजसिंह शिक्षण संस्थान के अध्यक्ष गोपालसिंह भलासरिया, बीजेपी के पूर्व जिलाध्यक्ष भोपालसिंह बड़ला, त्रिभुवनसिंह भाटी सहित बड़ी संख्या में राजपूत समाज के लोग उपस्थित रहे।

अब सियोल और मदेरणा में सीधा मुकाबला

वर्ष 2008 में राजपूत समाज के उम्मीदवार ने बीजेपी को त्रिकोणीय मुकाबले में तीसरे नम्बर पर धकेल दिया था, तब महिपाल मदेरणा जीते थे। वहीं, वर्ष 2018 में महेन्द्रसिंह भाटी ने निर्दलीय ताल ठोक कर 40 हजार मत हासिल किए थे। यही वजह रही कि उस वक्त कांग्रेस की उम्मीदवार दिव्या मदेरणा को जीत मिल गई। जबकि, इससे पहले वर्ष 2013 में हुए सीधे मुकाबले में भाजपा के भैराराम सियोल ने कांग्रेस उम्मीदवार लीला मदेरणा को टक्कर देते हुए हराया था। जब-जब यहां त्रिकोणीय संघर्ष हुआ, तब कांग्रेस को इसका फायदा मिला था।

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