संकट में महाराष्ट्र सरकार …फिर भी नहीं बदलेंगे ‘दिनमान’

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नीरज दवे

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों तेजी से करवट बदल रही है। सरकार में भागीदार शिवसेना के तेवर दिन-ब-दिन तल्ख होते जा रहे हैं। इस बार शिवसेना ने महंगाई की आड़ में सरकार को घेरा है। इतना ही नहीं, सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी तक दे डाली है। इधर, कांग्रेस में छटपटा रहे प्रदेश के कद्दावर राजनेता नारायण राणे ने भी ‘हाथ’ का साथ छोड़ दिया है। अटकलें लगाईं जा रहीं हैं कि राणे भाजपा में जाएंगे। लेकिन फिलहाल भाजपा ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है। माना तो यह भी जा रहा है कि राणे की एक बार फिर ‘घर वापसी’ हो सकती है। यानि कि राणे फिर से शिवसेना का दामन थाम सकते हैं।

इस बीच, देवेन्द्र फडणवीस सरकार गठन के शुरुआती काल में कभी भाजपा के दिग्गज नेता रहे एकनाथ खड़से भी सरकार और पार्टी की नीतियों को सार्वजनिक रूप से कोसने लगे हैं। मतलब साफ है कि महाराष्ट्र सरकार के ‘दिनमान’ आजकल कुछ खास अच्छे नहीं चल रहे हैं। मोदी सरकार के पिछले मंत्रिमंडल विस्तार से ऐन पहले हवा चली थी कि मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को भी दिल्ली बुलाया जा सकता है। हालांकि, बाद में खुद मुख्यमंत्री को ही इसका खंडन तक करना पड़ा था।

विधानसभा में विपक्ष के निशाने पर रहने वाली सरकार सदन के बाहर मित्र दलों और ‘अपनों’ के निशाने पर है। ऐसे मंजर एकाध बार नहीं, अक्सर दिख जाते हैं। विपक्ष जहां सरकार के कामकाज को लेकर तंज कस रही है, वहीं सरकार में भागीदार शिवसेना, भाजपा को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। पिछले दिनों शिवसेना के सांसदों और विधायकों ने मातोश्री में बैठकर सरकार से किनारा करने तक की रणनीति पर विचार मंथन किया। इसके बाद, शिवसेना नेता संजय राऊत ने ट्वीटर पर दनादन मैसेज पोस्ट कर समर्थन वापसी का संकेत देकर सनसनी फैला दी थी। तब बताया गया था कि पेट्रोल-डीजल के भाव तेजी से बढ़ रहे हैं और शिवसेना लोगों की इस तकलीफ में भागीदार नहीं बनना चाहती। ऐसे में जल्दी ही शिवसेना सरकार से अपना नाता तोड़ लेगी।

मतलब बहुत साफ है। शिवसेना के इरादे जगजाहिर हो चुके हैं। जिस दिन शिवसेना सरकार से अपना हाथ खींचेगी, फडणवीस सरकार एकाएक अल्पमत में आ जाएगी। तब सरकार को बरकरार रहने के लिए किसी और के समर्थन की दरकार रहेगी, जिसको लेकर नित नए कयास भी लग रहे हैं। सुना तो यहां तक जा रहा है कि इसके लिए भाजपा आलाकमान पहले से तैयारी कर चुका है। मोदी सरकार के पिछले मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान सुप्रिया सुळे को सरकार में शामिल करने की अटकलें उसी तैयारी का हिस्सा समझी जा रहीं हैं।

साफ है कि जरूरत पडऩे पर भाजपा शरद पवार से हाथ मिलाने के सपने पाले हुए है। अगर ऐसा होता है तो प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आना भी लाजमी है। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बरसों से कांग्रेस की सहयोगी रही है। गंभीर भ्रष्टाचार के चलते पार्टी के दिग्गज नेता छगन भुजबल अरसे से जेल में है और राकांपा के कई और नेता भी कानूनी लड़ाई में उलझे हैं। ऐसे में उनका साथ पाकर बैसाखी पर टिकने वाली सरकार बाद में भी विरोधियों के निशाने पर ही रहने वाली है। मतलब यह कि इतना सब कुछ होने के बाद भी महाराष्ट्र सरकार के ‘दिनमान’ बदलने वाले नहीं दिख रहे।