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भोपालगढ़: ढह गया मदेरणा का गढ़, तीन चुनाव हार चुकी कांग्रेस को नए चेहरे की तलाश

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नारद जोधपुर। कभी मदेरणा परिवार का गढ़ रहे जोधपुर के भोपालगढ़ विधान सभा क्षेत्र में कांग्रेस तीन चुनाव से जीत हासिल नहीं कर पाई है। कांग्रेस को भोपालगढ़ में एक मजबूत स्थानीय उम्मीदवार की तलाश है। जाट बाहुल्य इस सीट के आरक्षित होने के बाद से सारे समीकरण बदल गए। लगातार हार के बावजूद कांग्रेस इस क्षेत्र में जमीन से जुड़ा कोई प्रभावी चेहरा पेश नहीं कर पाई है। आगामी चुनाव में यहां से भाजपा और कांग्रेस दोनों नए चेहरों की तलाश में है। वहीं हनुमान बेनीवाल की आरएलपी ने भी गत चुनाव जीत अपना आधार काफी बढ़ा लिया है। ऐसे में इस क्षेत्र में एक बार फिर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा।

वर्ष 1967 में अस्तित्व में आई इस सीट पर अब तक हुए बारह चुनाव में से 8 बार कांग्रेस, दो बार भाजपा के अलावा एक-एक बार लोकदल और आरएलपी के विधायक चुने गए। कांग्रेस के दिग्गज नेता परसराम मदेरणा यहां से पांच बार विधायक चुने गए। जबकि एक बार उनके पुत्र महिपाल।

भोपालगढ़ के जातीय समीकरण

भोपालगढ़ व बावड़ी की सभी पंचायतों के अलावा पीपाड़ की 13 व मंडोर की 7 ग्राम पंचायतों को मिलाकर भोपालगढ़ विधानसभा क्षेत्र का गठन हुआ। इसमें करीब 2.87 लाख मतदाता है। इनमें से सबसे अधिक संख्या में करीब 85 हजार जाट मतदाता है। जाटों के अलावा मूल ओबीसी के मतदाता भी बड़ी संख्या में है।

मदेरणा की कर्मभूमि

भोपालगढ़ को परसराम मदेरणा की कर्मभूमि माना जाता है। इस सीट पर अब तक हुए बारह चुनाव में छह बार मदेरणा परिवार का तो एक बार परसराम मदेरणा के विश्वस्त माने जाने वाले रामनारायण डूडी विधायक चुने गए। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद से यहां के समीकरण पूरी तरह से बदल गए।

जब मदेरणा को करना पड़ा हार का सामना

वर्ष 1972 से लेकर परसराम मदेरणा यहां से लगातार तीन बार विधायक चुने गए। तब तक मदेरणा प्रदेश की राजनीति में प्रमुख चेहरे के रूप में स्थापित हो चुके थे। वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में भोपालगढ़ के मतदाताओं ने कद्दावर परसराम मदेरणा को यहां से हरा जोरदार झटका दिया। लोकदल प्रत्याशी नारायणराम बेड़ा ने मदेरणा को पटकनी दे सभी को चौंका दिया।

सबसे ज्यादा हार बेड़ा के नाम

भोपालगढ़ में नारायण राम बेड़ा के एक अनूठा रिकॉर्ड है। वे यहां से पांच बार चुनाव लड़े। इनमें से चार बार मदेरणा परिवार के खिलाफ। इन पांच में से सिर्फ एक बार ही वे जीत हासिल कर पाए। बेड़ा यहां से चार चुनाव हार चुके है।

अब बदल गए समीकरण

वर्ष 2008 में परिसीमन के बाद इस सीट के अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के बाद समीकरण पूरी तरह से बदल गए। सीट आरक्षित होते ही कांग्रेस का यह मजबूत गढ़ पूरी तरह से ढह गया। कांग्रेस यहां से जीत हासिल करने को तरस गई। लगातार तीन हार के बाद पार्टी ने इस बार भोपालगढ़ पर विशेष फोकस करने का दावा अवश्य किया है, लेकिन प्रत्याशी सामने आने के बाद ही पता चल सकेगा कि उसके दावे में कितनी मजबूती है।

आ सकते है नए चेहरे

आगामी चुनाव में कांग्रेस और भाजपा की तरफ से इस सीट पर नए चेहरों पर दाव खेलने की पूरी उम्मीद है। कांग्रेस हमेशा यहां से बाहरी प्रत्याशी थोपती रही। इसका खामियाजा उसे हार के रूप में उठाना पड़ा। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि पार्टी किसी स्थानीय चेहरे को अवसर प्रदान करती है या नहीं। वहीं आरएलपी की तरफ से वर्तमान विधायक पुखराज गर्ग के वापस चुनाव में उतरने की पूरी संभावना है।

अब तक भोपालगढ़ के विधायक

वर्ष 1967- एमपी राम- कांग्रेस
वर्ष 1972- परसराम मदेरणा-कांग्रेस
वर्ष 1977- परसराम मदेरणा- कांग्रेस
वर्ष 1980- परसराम मदेरणा-कांग्रेस
वर्ष 1985 नारायण राम बेड़ा- लोकदल
वर्ष 1990- परसराम मदेरणा- कांग्रेस
वर्ष 1993- रामनारायण डूडी- कांग्रेस
वर्ष 1998- परसराम मदेरणा-कांग्रेस
वर्ष 2003- महिपाल मदेरणा- कांग्रेस
वर्ष 2008- कमसा मेघवाल-भाजपा
वर्ष 2013- कमसा मेघवाल- भाजपा
वर्ष 2018- पुखराज गर्ग- आरएलपी

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