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बच्चों को गुरुकुल पद्धति की शिक्षा आज भी समय की मांग: संत कृपाराम

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तिंवरी। कृपाराम महाराज के मुखारविंद से चल रही नौ दिवसीय श्री राम कथा के पंचम दिवस श्री राम के विद्या अध्ययन के लिए गुरुकुल में जाने के प्रसंग को बताते हुए संत श्री कृपाराम ने कहा कि हमारे बच्चों को श्री राम जैसा आज्ञाकारी बेटा व एक अच्छा संस्कारवान व्यक्ति बनाना है तो बच्चों को गुरुकुल पद्धति की शिक्षा देना आज के जमाने की मांग है। संत श्री ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे रहना है, कैसे नहीं ये सब हमें हमारी भारतीय संस्कृति सिखाती है। वसुदेव कुटुंबकम की भावना केवल और केवल भारत ही रखता है। उन्होंने कहा कि कथा संस्कारों को सींचने का कार्य करती है। संस्कार ही जीवन का आधार है। जैसे श्री राम गुरुकुल की शिक्षा प्राप्त कर महल में आए तो वो प्रतिदिन सुबह उठकर माता-पिता के चरणों में प्रणाम करते थे, वैसे ही प्रत्येक बच्चे को मां-बाप मां-बाप व अपने से बड़ों के चरणों में प्रणाम करना चाहिए।

संत कृपाराम महाराज ने भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए कथा में आए हुए श्रोताओं को आह्वान किया की बच्चों को बचपन से ही संस्कार देने शुरू कर दो। संस्कार देने का सबसे बड़ा फर्ज है मां का मां अगर चाहे तो बच्चे को कुछ भी बना सकती है। अच्छे संस्कार दो उनको बताओ की हम किस की संताने है हमारे पूर्वजों के बारे में बताओ उनकी वीर कहानियां सुनाओ मां का कर्तव्य है बच्चों की सही परवरिश करना अगर सही संस्कार बचपन में ही मिल गए तो वो बड़े होने के बाद स्वामी विवेकानंद, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, श्रवण, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, कृष्ण जैसे वीर, योद्धा, देश भक्त, मातृ-पितृ भक्त, बन जाएंगे अगर सही संस्कार नहीं मिले तो वो आगे जाकर चोर, लुटेरा, कंस, दुर्योधन, रावण जैसे राक्षस न बन जाए। इसलिए संस्कार बचपन से ही दे देने चाहिए।

आपका व्यवहार आपके बच्चों पर बहुत प्रभाव डालता है आज के जमाने में आप जो बोलते है वो बच्चे नहीं करते परंतु आप क्या करते है ये बच्चे जरूर करते है इसलिए बच्चों के सामने क्या बोलना है क्या नहीं, क्या करना है क्या नहीं, इस का विशेष रूप से ध्यान दे, शरीर का आकार तो भगवान बनाता है लेकिन जीवन का आकार संस्कार बनाते है इसलिए आपके कैसे संस्कार है वैसे ही आपका जीवन बनता है बच्चों को भौतिक सुविधाओं तथा कार बंगले के साथ-साथ संस्कारवान शिक्षा जरूर देवे जो आने वाली सातों पीढ़ियों का कल्याण करती है। संत ने कहा कि जब भी आपको समय मिले तो आप अपनी आस पास की गौशाला, कोई आश्रम जहां आप को सेवा करने मन करे वहा हफ्ते में या फिर महीने में एक बार कर तन, मन, धन से सेवा कर ले, सेवा करने से तन का अभिमान दूर होता है और मन पवित्र हो जाता है। संत ने कहा कि एक समय आने पर दुनिया के काम काज से मुक्त होकर भगवान के भजन में लग जाना चाहिए जिससे आपका यह लोक भी सुधार जाए और पर लोक भी सुधार जाए।

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