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‘हरियाणा में 37.4% बेरोज़गारी’ – खट्टर और विपक्षी हंगामे के बावजूद अपनी रिपोर्ट पर कायम है CMII

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 कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा पूरे भारत में बेरोजगारी की सबसे अधिक दर दर्ज करने हेतु हरियाणा पर हमला बोलने के लिए अपनी रिपोर्ट का हवाला देने के कुछ ही दिनों बाद, सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के एक सर्वेक्षण से प्राप्त निष्कर्ष राज्य के सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक तू तू-मैं मैं की वजह बन गयी हैं.

दिसंबर 2022 में प्रचलित बेरोजगारी दर के लिए सीएमआईई का डेटा 8.3 प्रतिशत की राष्ट्रीय बेरोजगारी दर के मुकाबले 37.4 प्रतिशत की बेरोजगारी दर के साथ हरियाणा को इस मामले में शीर्ष स्थान पर दर्शाता है.

पिछले हफ्ते जब ‘भारत जोड़ो यात्रा’ अपने हरियाणा चरण के तहत खट्टर के गृह निर्वाचन क्षेत्र करनाल पहुंची थी, तो राहुल ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार पर निशाना साधने हुए कहा था, ‘21 वीं सदी में, हरियाणा बेरोजगारी के मामले में चैंपियन है, आपने सभी को पीछे छोड़ दिया है.’

सोमवार को चंडीगढ़ में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए खट्टर ने सीएमआईई द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया. CMIE बेरोजगारी के आंकड़ों को निराधार और तथ्यों से परे बताते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘ये आंकड़े बहुत छोटे सर्वेक्षण नमूने पर आधारित हैं.’

सीएमआईई की इस रिपोर्ट ने दिसंबर के महीने में 37.4 प्रतिशत की बेरोजजारी दर के साथ हरियाणा को बेरोजगारी तालिका में शीर्ष पर रखा हुआ था, इसके बाद राजस्थान (28.5 प्रतिशत), दिल्ली (20.8 प्रतिशत), बिहार (19.1 प्रतिशत) और झारखंड (18 प्रतिशत) का नंबर था.

इस बीच, CMII के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी महेश व्यास ने अपनी संस्था के रिपोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन करते हुए कहा कि उंनका सैंपल साइज (नमूना आकार) आधिकारिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे) से बहुत बड़ा था.

व्यास ने दिप्रिंट को बताया, ‘माननीय मुख्यमंत्री जी अपने स्वयं के विचार रखने के हकदार हैं और सीएमआईई उसका सम्मान करता है. यहां हम इस बात को स्पष्ट करना चाहते हैं कि हरियाणा में सीएमआईई का सैंपल साइज 5,874 घरों का था, जबकि आधिकारिक पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) का सैंपल साइज 2,608 घरों का है. सीएमआईई का अनुमान भी पीएलएफएस सर्वेक्षण की ही तरह घरेलू सर्वेक्षण पर आधारित है.’

‘आंकड़े छिपाना एक खतरनाक प्रवृत्ति है’

पिछली 4 जनवरी को राज्य में विपक्ष के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने ‘हरियाणा में तेजी से बढ़ती बेरोजगारी को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाने में विफल’ रहने हेतु खट्टर सरकार पर जमकर निशाना साधा था.

दिसंबर महीने के लिए सीएमआईई की बेरोजगारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए, हुड्डा ने कहा था, ‘महीने और साल बदलते जाते हैं, लेकिन इससे (राज्य के) आम लोगों को कोई राहत नहीं मिलती है क्योंकि हरियाणा देश में बेरोजगारी के मामले में नंबर एक बना हुआ है. यह (बेरोजगारी दर) राष्ट्रीय औसत से साढ़े चार गुना ज्यादा है. पिछले महीने (नवंबर में) हरियाणा में बेरोजगारी दर 30.6 फीसदी थी. ऐसा लगता है कि हरियाणा हर बार बेरोजगारी के मामले में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रहा है.‘

इस बारे में बात करते हुए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान के पूर्व डीन मदन मोहन गोयल ने कहा कि बेरोजगारी को मापने के लिए आंकड़े इकट्ठा करने की कोई भी पद्धति एकदम से सही और 100 प्रतिशत विश्वसनीय नहीं है.

गोयल ने कहा, ‘संगठित क्षेत्र में रोजगार का डेटा असंगठित क्षेत्र (जिसकी भारत में कुल रोजगार में लगभग 90 प्रतिशत की हिस्सेदारी है) के आंकड़ों की तुलना में अधिक विश्वसनीय है. लेकिन यह हमेशा से ऐसा ही रहा है.’

सीएमआईई की इस रिपोर्ट की खट्टर द्वारा की गई आलोचना पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इन आंकड़ों को सिर्फ इस वजह से छुपाना क्योंकि ये सरकार के लिए अरुचिकर साबित हो रहे हैं, एक खतरनाक प्रवृत्ति है.

उन्होंने इस बात का सुझाव भी दिया कि राज्य सरकार को बेरोजगारी और छिपी हुई बेरोजगारी को कम करने के लिए ग्रामीण औद्योगीकरण से जुड़े कदम उठाना चाहिए. उन्होंने कहा कि न केवल उद्योगों को, बल्कि कृषि से जुड़े उद्योगों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि इसे (राज्य सरकार को) सामाजिक एकजुटता की एक प्रक्रिया के माध्यम से युवाओं को स्वयं सहायता समूहों (सेल्फ हेल्प ग्रुप्स) के साथ संगठित करना चाहिए, क्षमता निर्माण के लिए उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए और स्वरोजगार के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बैंक ऋण और सरकारी अनुदान (सब्सिडी) के सम्मिश्रण के माध्यम से आय पैदा करने वाली परिसंपत्ति (इनकम-जनरेटिंग एसेट्स) का प्रावधान करना चाहिए.


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