46.1 C
Jodhpur

राहुल पहले नेता नहीं जिनकी विदेश में टिप्पणी से विवाद छिड़ा- इंदिरा, मोरारजी और मोदी भी हैं कतार में

spot_img

Published:

राहुल गांधी की टिप्पणी विदेश में किसी भारतीय राजनेता द्वारा की गई पहली टिप्पणी नहीं है जिसने देश में हंगामा मचा दिया है. जैसा कि भाजपा ने राहुल से ब्रिटेन में भारत को ‘बदनाम’ करने के लिए माफी मांगने की मांग की, कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशी धरती पर दिए गए बयानों की ओर इशारा करते हुए कहा कि इससे भी भारत की छवि खराब हुई है.

विदेशी धरती पर भारत की कथित बदनामी की यह लड़ाई कोई नई नहीं है. लंदन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, राहुल को वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गुप्ता ने बताया कि जब उनकी दादी इंदिरा गांधी 1978 में जेल से रिहा होने के बाद ब्रिटेन आई थीं, तो मोरारजी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने “भारत के बारे में कुछ भी नकारात्मक कहने से इनकार कर दिया था,” जब उनसे उनकी गिरफ्तारी में देसाई की भूमिका के बारे में पूछा गया था.

उस समय इंदिरा विपक्ष में थीं. हालांकि, ब्रिटेन में देसाई के बारे में बुरा बोलने से इनकार करने का आरोप पूरी तरह से सच नहीं है, जैसा कि टाइम शो की प्रेस रिपोर्ट में कहा गया है.

देसाई ने अपनी ओर से उस समय हंगामा खड़ा कर दिया जब उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के साथ अपनी बातचीत में पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा परमाणु परीक्षण को एक “गलत” कदम बताया.

अभी हाल ही में, कांग्रेस सांसद और महासचिव जयराम रमेश, जो भाजपा के हमलों के खिलाफ पार्टी की कम्यूनिकेशन स्ट्रैटिजी का नेतृत्व कर रहे हैं, 2010 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री रहते हुए बीजिंग में एक टिप्पणी से खफा हो गए थे.

दिप्रिंट विदेशों में विभिन्न राजनेताओं द्वारा दिए गए कुछ बयानों पर नजर डाल रहा है और इसकी शुरुआत मोदी के बयान से की है.

नरेंद्र मोदी

मंगलवार को, जब संसद सत्र का एक और दिन खत्म हुआ तब कांग्रेस ने पांच उदाहरणों के साथ एक सूची जारी की जब पीएम ने भारत को “शर्मिंदा” किया.

भाषणों में एक मई 2015 में पीएम मोदी की तीन देशों की यात्रा के दौरान दक्षिण कोरिया की यात्रा के समय, उन्होंने सियोल में भारतीय प्रवासियों को संबोधित किया था.

कार्यक्रम में मोदी ने कहा था कि पहले यह माना जाता था कि भारत में जन्म लेना पिछले जन्म में किए गए पापों की सजा है. “पिछले एक साल में, भारत के बारे में लोगों की धारणा बदली है. एक समय था जब लोग यह सोचकर भारत छोड़ देते थे कि देश अच्छा नहीं है.”

भाषण में मोदी ने आगे कहा, “एक समय था जब लोग सोचते थे कि पिछले जन्म में हमने ऐसा कौन सा पाप किया है कि वे भारत में पैदा हुए हैं. क्या यह एक देश है? क्या यह सरकार है? ये लोग हैं कौन? वे चले जाते थे. हम औद्योगिक जगत के लोगों को यह कहते हुए देखते थे कि वे भारत में व्यापार नहीं करना चाहते. हम जीना नहीं चाहते. वास्तव में, अधिकांश लोगों का एक पैर (भारत के) बाहर रहा करता था.”

टोरंटो में, अप्रैल 2015 में उसी त्रिकोणीय राष्ट्र के दौरे के समय, मोदी ने कहा कि भारत अब “स्कैम इंडिया” नहीं रहा है बल्कि “स्किल इंडिया ” हो गया है. जो बाद में उनकी सरकार की प्रमुख कौशल विकास पहलों में से एक की सॉफ्ट घोषणा की तरह था.

उन्होंने कहा, “जिनको गंदगी करनी थी, वो गंदगी कर के चले गए, पर हम सफाई करेंगे.”

इसी तरह, जून 2018 में दोहा में, मोदी ने कांग्रेस के परोक्ष संदर्भ में कहा था कि भ्रष्टाचार एक “दीमक” है जिसने भारत को “खोखला” कर दिया है.

उन्होंने कहा, “भ्रष्टाचार ने हमारे देश को खोखला कर दिया है, दीमक की तरह इसकी जड़ों को खा रहा है. आज दुनिया भर में भारत की छवि में निखार आया है और देश को सम्मान के साथ देखा जा रहा है. भारत की ओर हर कोई आकर्षित है. आपने बदलाव देखा होगा जब दूसरे देशों के लोग भारतीयों से मिलते हैं.”


जयराम रमेश

मई 2010 में चीन के एक आधिकारिक दौरे पर तत्कालीन पर्यावरण और वन राज्य मंत्री जयराम रमेश से पूछा गया था कि क्या भारत अरुणाचल प्रदेश में हाइड्रोलॉजिकल परियोजनाओं को लागू करने के लिए चीनी विशेषज्ञता पर काम करेगा.

जयराम ने कहा, “भारत ने अरुणाचल प्रदेश में हाइड्रोलॉजिकल परियोजनाओं का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम तैयार किया है, लेकिन उसके पास उस तरह का अनुभव नहीं है जैसा कि चीन ने बड़े पैमाने पर थ्री गोरजेस डैम के निर्माण में हासिल किया है. विशाल पनबिजली परियोजनाओं को संभालने की हमारी क्षमता चीन की तुलना में बहुत कम है.”

जब विवाद बढ़ा तब उन्होंने ह्यूआवेई जैसी चीनी दूरसंचार कंपनियों के प्रति गृह मंत्रालय की “डर पैदा करने वाली” और “पागल” नीतियों की आलोचना की.

उस समय यह बताया गया था कि रमेश की टिप्पणियों से प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और दिल्ली “अवाक” रह गए थे. देश में राजनीतिक प्रतिक्रिया के बीच, पीएम ने जयराम को फोन किया और उनकी टिप्पणियों के लिए उनकी खिंचाई की. सिंह ने कथित तौर पर अपने मंत्री से कहा कि वह अपने डोमेन के बाहर मंत्रालयों के कामकाज पर टिप्पणी नहीं कर सकते, वह भी विदेशी धरती पर.

इंदिरा गांधी

नवंबर 1978 के वाशिंगटन पोस्ट के एक लेख में, इंदिरा गांधी की यूके यात्रा का वर्णन किया गया है – गिरफ्तारी से उनकी रिहाई के बाद की यात्रा जिसके बारे में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गुप्ता “विवादों से भरी यात्रा” बता रहे थे. 1975 में शुरू हुए 21 महीने के लंबे आपातकाल को लागू करने में उनकी भूमिका के कारण इस यात्रा में उन्हें “नाज़ी” और “तानाशाह” कहा गया.

लेख में कहा गया है, “गांधी कई बार उद्दंड और कई बार रक्षात्मक थीं, लेकिन अपने पूरे प्रवास के दौरान उन्होंने यह नोटिस दिया कि वह प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को कोई मौका नहीं देना चाहती थीं.”

एक संवाददाता सम्मेलन में आपातकाल के बारे में पूछे जाने पर, इंदिरा ने कहा कि “नई (मोरारजी देसाई) सरकार के सत्ता संभालने के बाद से कहीं अधिक लोगों ने अपनी जान, संपत्ति और नौकरियां खोई हैं.”

उस समय, सत्तारूढ़ जनता पार्टी ने इंदिरा पर यात्रा पर प्रचार करने का आरोप लगाया क्योंकि यह चिकमंगलूर लोकसभा उपचुनाव में उनकी प्रसिद्ध जीत के बाद आया था.

उन्होंने उस यात्रा के दौरान यह भी कहा कि जनता पार्टी ने गरीब से गरीब व्यक्ति की मदद करने की उनकी 20 सूत्री योजना को वापस ले लिया है. उन्होंने कहा था,“… जनता पार्टी ने पिछले दो वर्षों में चीजों को उल्टा कर दिया है. कुछ चीजें जो चल रही हैं वे वास्तव में भयानक हैं, बस भयावह हैं. ”

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में इस रिपोर्ट को लेकर दावा किया गया है कि इंदिरा ने “जनता सरकार पर क्रूर हमला” किया और यहां तक कि उनके और उनके परिवार के पश्चिमी मीडिया की कवरेज की भी आलोचना की. उन्होंने कहा, “वे हमेशा मेरे खिलाफ रहे हैं,” रिपोर्ट ने कहा गया कि उन्होंने आरोप लगाया कि, “न केवल मेरे बल्कि मेरे पिता और अतीत में गांधीजी के खिलाफ भी.”

एक अन्य अवसर पर, उन्होंने एक रिपोर्टर से कहा, “अब जब इस देश में फॉक्स-बाइटिंग फैशन से बाहर हो गई है, तो उन्होंने एक और नाम खोज लिया है: इंदिरा बाइटिंग.”

मोरारजी देसाई

1978 में अमेरिका के दौरे के दौरान, प्रधानमंत्री के रूप में चुने जाने के बमुश्किल एक साल बाद, मोरारजी देसाई ने कथित तौर पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को बताया कि 1974 का पोखरण परमाणु परीक्षण “मूल रूप से गलत” था.

इस प्रकरण का खुलासा 27 मई 1977 को देसाई और अमेरिकी राजदूत रॉबर्ट गोहेन के बीच एक बातचीत के रिकॉर्ड में हुआ था – जिसे बाद में डिक्लासीफाइड किया गया था.

रिकॉर्ड बताते हैं, “श्रीमती गांधी मूल रूप से गलत थीं, लेकिन देसाई उनकी सार्वजनिक आलोचना नहीं करना चाहते थे. प्रधानमंत्री ने कहा कि एक और विस्फोट होने का सवाल ही नहीं उठता. यहां तक कि अगर यह प्रस्तावित किया जाता है तो भी वह ऐसा नहीं करेंगे – वह सावधानी से लोगों से इसपर परामर्श करेंगे यहां तक की वह अमेरिका से भी परामर्श करेंगे.”

 


[bsa_pro_ad_space id=2]
spot_img
spot_img

सम्बंधित समाचार

Ad

spot_img

ताजा समाचार

spot_img
error: Content is protected !!