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राजस्थान में पायलट VS गहलोत के बीच क्या PM मोदी कर रहे हैं गुर्जर समुदाय को लुभाने की कोशिश

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 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को गुर्जर समुदाय के देवता श्री देवनारायण की पूजा-अर्चना के लिए राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के सुदूरवर्ती गांव मलसेरी डूंगरी जाएंगे.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गुर्जर समुदाय के देवता के मंदिर की यह यात्रा दरअसल राज्य के एक प्रभावशाली समुदाय को लुभाने की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की कोशिश का हिस्सा है. इसे खासकर ऐसे समय में बेहद अहम माना जा रहा है, जब उनके प्रमुख नेता, कांग्रेस के सचिन पायलट सीएम की कुर्सी को लेकर राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ टकराव में उलझे हैं.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि राज्य में इस साल के अंत में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र यह यात्रा गुर्जर समुदाय के बीच एक सशक्त संदेश पहुंचाने वाली होगी. दिप्रिंट से बातचीत करने वाले कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के नेताओं का कहना है कि यह समुदाय राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से कम से कम 35 से 40 और लोकसभा की 25 सीटों में से कम से कम 12 पर खासा दखल रखता है.

पायलट और गहलोत के बीच जारी सत्ता संघर्ष ने राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है, और नेताओं को आशंका है कि अगर आलाकमान ने हस्तक्षेप नहीं किया और गतिरोध दूर नहीं किया गया तो आने वाले चुनावों में पार्टी को इसकी खासी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

राजस्थान बीजेपी के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि पीएम अपनी यात्रा के दौरान समुदाय के कल्याण के लिए कुछ अहम घोषणा कर सकते हैं.

2018 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की तरफ से मैदान में उतारे गए सभी नौ गुर्जर उम्मीदवार चुनाव हार गए थे, जबकि कांग्रेस की तरफ से मैदान में उतारे गए इस समुदाय के 11 उम्मीदवारों में से सात ने जीत हासिल की थी, इनमें टोंक से सचिन पायलट, बूंदी से अशोक चांदना, बानसूर से शकुंतला रावत और विराट नगर से इंद्रराज सिंह गुर्जर शामिल हैं. बाद में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर जीते एक गुर्जर नेता जोगिंदर सिंह अवाना भी कांग्रेस में शामिल हो गए और यह संख्या बढ़कर आठ हो गई.

राजनीतिक टिप्पणीकार और वर्धमान महावीर ओपन यूनिवर्सिटी, कोटा के पूर्व कुलपति नरेश दधीच कहते हैं, मोदी की मालासेरी के देवनारायण मंदिर की यात्रा का उद्देश्य गुर्जर समुदाय को बीजेपी के पाले में लाना है.

उन्होंने कहा, ‘‘राज्य में गुर्जर समुदाय आज संगठित नहीं है. पिछले साल समुदाय के सबसे बड़े नेता किरोड़ी सिंह बैंसला के निधन के बाद नेतृत्व के स्तर पर एक खालीपन है. गुर्जरों ने 2018 में इस उम्मीद के साथ कांग्रेस को वोट दिया था कि सचिन पायलट समुदाय से आने वाले पहले सीएम बन सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ऐसे में गुर्जरों के कांग्रेस से छिटकने के आसार हैं. भाजपा को इसमें एक मौका नज़र आ रहा है और वो इसका फायदा उठाने की कोशिश में है.’’

गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रमुख विजय बैंसला ने दिप्रिंट को बताया कि देवनारायण मंदिर धार्मिक स्तर पर इस समुदाय के लिए बहुत ही खास महत्व रखता है. न केवल राजस्थान बल्कि मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित आसपास के राज्यों से बड़ी संख्या में गुर्जर समुदाय के लोग यहां पूजा-अर्चना करने आते हैं.

बैंसला अपने पिता स्वर्गीय किरोड़ी सिंह बैंसला के साथ 2019 में भाजपा में शामिल हुए थे. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे खुशी है कि मोदी जी मलसेरी डूंगरी मंदिर जा रहे हैं. इस यात्रा से समुदाय को काफी फायदा होगा.’’

हालांकि, बैंसला खुद भाजपा में हैं, लेकिन उनका कहना है कि पार्टी को इस समुदाय को हल्के में नहीं लेना चाहिए. वे कहते हैं, ‘‘हमारा रुख पूरी तरह साफ है. यदि भाजपा ने कांग्रेस में मजबूत गुर्जर नेतृत्व के खिलाफ किसी मजबूत गुर्जर नेता को खड़ा नहीं किया तो समुदाय उसके हिसाब से अपना फैसला करेगा. यह आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए समस्या बन सकता है.’’


‘राजनीतिक दौरा नहीं’

हालांकि, राजस्थान के भाजपा प्रमुख सतीश पूनिया ने कहा कि हर चीज़ को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘‘प्रधानमंत्री की यह यात्रा दरअसल राजनीतिक नहीं बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक है. यह प्राचीन मंदिरों के पुनरुद्धार और काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर की तरह हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के उनके मिशन का हिस्सा है. हर चीज को सिर्फ राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.’’

वैसे, ऑफ-द-रिकॉर्ड बातचीत में राज्य भाजपा नेताओं ने माना कि पार्टी गुर्जरों को फिर अपने पाले में लाने की कोशिश में लगी है. नाम न छापने की शर्त पर बीजेपी के एक नेता ने कहा, ‘‘वे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) मतदाताओं में अहम हिस्सेदारी रखते हैं और प्रधानमंत्री की मंदिर यात्रा से इस समुदाय के बीच एक मजबूत संदेश जाएगा. पीएम के काशी विश्वनाथ गलियारे की तर्ज पर यहां के मंदिर में भी एक गलियारा बनाने की योजना के बारे में घोषणा किए जाने की भी संभावना है.’’

राज्य में गुर्जरों की आबादी लगभग 9 प्रतिशत है और इनका मुख्यत: पूर्वी राजस्थान में अच्छा-खासा प्रभाव है,

अपना नाम ज़ाहिर न करने के इच्छुक राज्य के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा कि जगजाहिर है कि बतौर समुदाय गुर्जर एकतरफा मतदान करते हैं और 2018 में उन्होंने पायलट का समर्थन किया था क्योंकि उन्हें लगा था कि वह सीएम बन सकते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन अब चीजें बदल गई हैं. पायलट और सीएम अशोक गहलोत के बीच रस्साकशी ने समुदाय के बीच अनिश्चितता का माहौल बना दिया है. हम चाहते हैं कि वे फिर से हमारे साथ आएं और हम समुदाय के बीच पैठ बनाने में जुटे हैं.’’

उन्होंने बताया कि भाजपा मेगा कार्यक्रम आयोजित करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है. उनके मुताबिक, ‘‘सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ता आसींद में इंतज़ाम करने में जुटे हैं. राज्य के भाजपा नेताओं के साथ केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भी सारी व्यवस्थाओं पर नज़र रख रहे हैं.’’


‘पहले राजनीतिक समुदाय की तरह नहीं देखा जाता था’

फिलहाल, गुर्जरों को चार अन्य समुदायों बंजारा, गड़िया-लोहार, रेबाड़ी और गडरिया के साथ अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) श्रेणी के तहत राजस्थान की सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 5 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिल रहा है.

इसके अलावा, उन्हें अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) श्रेणी के तहत 1 प्रतिशत आरक्षण मिलता है.

दधीच ने बताया कि गुर्जरों को पहले राजनीतिक समुदाय के तौर पर नहीं देखा जाता था. उन्होंने बताया, ‘‘किरोड़ी सिंह बैंसला ने ही समुदाय को संगठित करना शुरू किया, और उन्होंने ही 2007 के आंदोलन का नेतृत्व किया था. इस आंदोलन के दौरान समुदाय को अनुसूचित जनजाति श्रेणी के तहत लाने की मांग की गई थी. आंदोलन हिंसक हो जाने की वजह से इसमें तीन दर्जन से अधिक लोग मारे गए थे.’’

राज्य सरकार की तरफ से उनकी मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिए जाने के बाद ही आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन मांगें पूरी न होने पर बैंसला के नेतृत्व में गुर्जरों ने 2008 में फिर आंदोलन शुरू कर दिया. इस दौरान भड़की हिंसा में 42 लोगों की मौत हो गई थी.

दधीच ने कहा, ‘‘इसके बाद ही राजनीतिक दलों का ध्यान इस तरफ गया. वह किरोड़ी सिंह बैंसला ही थे जिन्होंने गुर्जर समुदाय को राजनीतिक स्तर पर संगठित किया और उन्हें एक महत्वपूर्ण वोटबैंक बनाया.’’

बैंसला ने 2010 और 2019 में दो और आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिसके बाद गहलोत सरकार ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत गुर्जरों और चार अन्य घुमंतू समुदायों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने वाला एक विधेयक पारित किया.

विजय बैंसला के मुताबिक, गुर्जर चार अन्य एमबीसी समुदायों के साथ सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘राज्य की 200 विधानसभा सीटों में से 75 में एमबीसी वोटबैंक 28,000 से 78,000 के बीच हैं. विधानसभा में 37 विधायक एमबीसी के समर्थन से चुने जाते हैं और अति पिछड़ा वर्ग में 85-90 प्रतिशत हिस्सेदारी गुर्जरों की है. लोकसभा की बात करें तो वे राज्य की 25 में से 12 सीटों पर असर डालने की क्षमता रखते हैं. तो एमबीसी को अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिलना चाहिए? हमारी लड़ाई उसी के लिए है.’’

2018 में बसपा से कांग्रेस में शामिल होने वाले गुर्जर नेता जोगिंदर सिंह अवाना ने दिप्रिंट को बताया कि श्री देवनारायण की 1,111वीं जयंती एक बहुत ही पावन अवसर है और इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए.

समुदाय के कल्याण के लिए योजनाओं को लागू करने के लिए अधिकृत देवनारायण बोर्ड के अध्यक्ष अवाना ने कहा, ‘‘तथ्य तो यही है कि गुर्जरों को 5 फीसदी आरक्षण कांग्रेस सरकार के राज में ही मिला है. हालांकि, देवनारायण बोर्ड 2008 में बीजेपी सरकार के कार्यकाल में स्थापित किया गया और योजनाएं लागू की गई थी, लेकिन वह गहलोत सरकार ही थी जिसने योजनाओं का विस्तार किया और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया.’’

 


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