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राजनाथ सिंह के सामने छीना माइक: शेरगढ़ में पुरानी है वर्चस्व की होड़, फिलहाल थमने के नहीं है आसार

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जोधपुर. बालेसर में केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथसिंह के सामने भाजपा की गुटबाजी खुलकर सामने आ गई। चुनावी वर्ष में पार्टी की खुलेआम हुई फजीहत से स्पष्ट हो गया कि जोधपुर जिले के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में गुटबाजी हावी रहेगी। यह गुटबाजी मुख्य रूप से केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे खेमे के बीच है। वर्चस्व की होड़ में कभी बाबूसिंह से खास माने जाने वाले नेताओं ने ही उनके हाथ से माइक छीन लिया। शेरगढ़ में फिलहाल गुटबाजी पर लगाम लगने के आसार नजर नहीं आ रहे है।
बालेसर में कल जनसभा में स्थानीय नेताओं के बीच हुई विवाद को राजनाथ ने बेहद गंभीरता से लिया। बाद में नेताओं के साथ आपसी बातचीत में उन्होंने अपनी नाराजगी भी जताई। पार्टी प्रदेश नेतृत्व ने भी इस घटना को गंभीरता से लिया है। अब देखने वाली बात यह होगी कि पार्टी नेतृत्व इस गुटबाजी को कैसे और कितना कम कर पाता है?
इस कारण है गुटबाजी
बाबूसिंह राठौड़ और शेखावत छात्र राजनीति से निकले है। दोनों ही जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके है। हालांकि बाबूसिंह को राजनीति में पहले मौका मिला और वे शेरगढ़ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में लगातार तीन बार विजयी रहे। बाबूसिंह शुरू से वसुंधरा राजे खेमे से दूर रहे। भाजपा में गजेन्द्र सिंह शेखावत के बढ़ते कद के बाद बाबूसिंह ने वसुंधरा राजे खेमे से अपनी नजदीकी बढ़ा ली। इसके बाद से शेखावत व बाबूसिंह के बीच राजनीतिक दूरियां बढ़ती गई। बढ़ती गुटबाजी के कारण गत चुनाव में बाबूसिंह को हार का सामना करना पड़ा। बाबूसिंह की हार के बाद गुटबाजी कम होने के बजाय और बढ़ गई।
राठौड़ और इंदा में वर्चस्व की होड़
शेरगढ़ विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से राजपूत बाहुल्य सीट है। अब तक हुए सभी चुनाव में यहां से राजपूत प्रत्याशी ही विजयी होता आया है। राजपूत समाज यहां पर राठौड़ व ईंदा में विभाजित है। राठौड़ में भी गोगादेव व देवराज है। यहां की राजनीति में हमेशा से राठौड़ का वर्चस्व रहा। सात बार तो अकेले खेतसिंह राठौड़ शेरगढ़ से विधायक चुने गए। वर्ष 1990 में भाजपा ने पहली बार किसी इंदा के रूप में मनोहरसिंह को प्रत्याशी बनाया और वे विजयी रहे, लेकिन वे महज ढाई साल तक ही विधायक रह पाए और विधानसभा भंग कर दी गई। इसके बाद से किसी इंदा को टिकट नहीं मिला। ऐसे में हर बार इंदा समाज के लोग टिकट हासिल करने का भरसक प्रयास करते है। कल का विवाद भी इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है।
कभी समर्थक थे अब विरोधी
कल बाबूसिंह के हाथ से माइक छीन लेने वाले सहित कुछ अन्य नेता कभी उनके कट्‌टर समर्थक रह चुके है। ये लोग बाबूसिंह के साथ ही मंडराते रहते थे। गत चुनाव में इन लोगों ने बाबूसिंह से दूरी बना ली। इस गुटबाजी के कारण बाबूसिंह को हार का सामना करना पड़ा था। पांच साल में बाबूसिंह ने अपना खोया जनाधार वपस हासिल करने का भरसक प्रयास किया, लेकिन इन लोगों को नहीं मना पाए। अब देखने वाली बात यह होगी कि आगामी चुनाव में इस गुटबाजी का कांग्रेस फायदा उठा पाती है या नहीं?


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