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‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का श्रेय कांग्रेस को नहीं, सशस्त्र क्रांतिकारियों को जाता है’- अमित शाह

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 केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार को कहा कि स्वतंत्रता के लिए अहिंसक आंदोलन की सफलता का श्रेय ‘सशस्त्र क्रांति द्वारा प्रज्वलित देशभक्ति की आग’ को दिया जाना चाहिए. शाह ने यह टिप्पणी अर्थशास्त्री संजीव सान्याल की पुस्तक ‘रेवोल्यूशनरी- द अदर स्टोरी ऑफ़ हाउ इंडिया वन इट्स फ्रीडम’ के लॉन्च के मौके पर कही. संजीव सान्याल प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं.

कार्यक्रम में बोलते हुए, शाह ने कहा कि इस पुस्तक का शीर्षक ‘अन्य कहानियां’ भी रखा जा सकता था क्योंकि इसमें ‘एक कथा के माध्यम से एक कहानी को सार्वजनिक रूप से स्थापित किया गया है. इतिहास, शिक्षा और लेखन के माध्यम से जनता के सामने एक अलग नज़रिये को रखा गया.

उन्होंने कहा कि सान्याल की पुस्तक उस आख्यान का मुकाबला करने में मदद करेगी, जिससे पता चलेगा कि क्रांतिकारियों ने 1930 में कांग्रेस से पहले ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के विचारों को प्राप्त कर लिया था.

शाह ने तुरंत स्पष्ट किया कि उनका यह मतलब नहीं है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले अहिंसा आंदोलन की स्वतंत्रता संग्राम में कोई भूमिका नहीं थी या यह इतिहास का हिस्सा नहीं था. उन्होंने कहा ‘यह इतिहास का हिस्सा है और इस आंदोलन का बहुत बड़ा योगदान है.’ हालांकि उन्होंने आगे कहा, ‘समानांतर’ सशस्त्र संघर्ष के बिना, स्वतंत्रता प्राप्त करने में ‘शायद कई और दशक लग जाते’.

उन्होंने कहा, स्वतंत्रता, ‘विभिन्न व्यक्तियों, संगठनों, विचारों, विचारधाराओं और पथों के ‘सामूहिक प्रयासों’ का परिणाम था जो एक ही लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे थे.

इतिहासकार आर.सी. मजूमदार का उदाहरण देते हुए शाह ने सुझाव दिया कि स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका के बारे में लिखने वाले भारतीय विद्वानों को दरकिनार करना एक जानबूझकर किया गया प्रयास था. उन्होंने कहा, ‘इतिहास केवल जीत या हार के आधार पर नहीं लिखा जाना चाहिए बल्कि सभी के प्रयासों और संघर्षों को देखते हुए लिखा जाना चाहिए’.

शाह ने पिछले साल 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान का भी जिक्र किया, जब उन्होंने भारतीयों से अपने औपनिवेशिक अतीत को ‘छोड़ने’ और अपनी जड़ों पर ‘गर्व करने’ का आग्रह किया था. शाह ने दिल्ली के इस कार्यक्रम में कहा कि ‘देश को इस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने के लिए, मुझे लगता है कि सबसे बड़ा काम, लिखित इतिहास के क्षेत्र में किया जाना चाहिए.’

इस मुद्दे पर गहराई से विचार करते हुए, केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के ‘समग्र इतिहास’ को दर्ज करने के लिए जिम्मेदार लोगों ने भारतीय दृष्टिकोण से ऐसा नहीं किया.

उन्होंने कहा, ‘कई बार, हम वामपंथी विचारधारा या कांग्रेस को अन्य क्रांतिकारियों के योगदान की अनदेखी करने के लिए दोषी ठहराते हैं, लेकिन अब हमें स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में लिखने से कोई नहीं रोक सकता है, जिन्हें नजरअंदाज किया गया हैं.’

शाह ने तब इतिहास के छात्रों और शिक्षकों से 300 व्यक्तित्वों और 30 साम्राज्यों की पहचान करने का आह्वान किया, जिन्होंने भारत को एक महान देश बनाया. उन्होंने कहा, ‘हमें बताया गया था कि मुगल पहले साम्राज्य थे लेकिन ऐसा नहीं है, ऐसे साम्राज्य रहे हैं जिन्होंने इस देश पर 200 से अधिक वर्षों तक शासन किया है.’

उन्होंने आगे कहा कि 1857 का विद्रोह स्वतंत्रता की पहली लड़ाई थी जिसने कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी.

जिन लोगों पर उन्होंने ‘क्रांतिकारियों की अनदेखी’ करने का आरोप लगाया, उन पर निशाना साधते हुए शाह ने कहा, ‘वे लोग नहीं जानते कि जब भगत सिंह को फांसी दी गई थी, तो लाहौर से कन्याकुमारी तक घर में चूल्हा नहीं जला था.’

उन्होंने कहा, ‘अब, अगर आप यह कहते हुए इतिहास लिखते हैं कि भगत सिंह के शहीद होने पर देश आजाद नहीं हुआ था, तो यह है.’

अपने तर्क के आधार पर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता ने कहा कि वंदे मातरम के लेखक बंकिम चंद्र चटर्जी ने ‘अपने गीत के माध्यम से भारत की अंतरात्मा को जगाया, लेकिन इतिहास ने उन्हें उनका हक नहीं दिया.’

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