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क्यों ‘प्राइड ऑफ प्रयागराज’ UP के नेताओं और अधिकारियों के बीच खींचतान का नया फ्लैशपॉइंट बना

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 उत्तर प्रदेश के निर्वाचित नेता सिविल सेवकों की सरेआम जमकर खिंचाई कर रहे हैं. हाल-फिलहाल का मामला शिक्षा निदेशालय को प्रयागराज से लखनऊ स्थानांतरित करने के प्रस्ताव का है. इस मामले पर उपमुख्यमंत्री ने ‘गलत आदेश जारी करने वाले अधिकारियों’ की जांच का वादा किया है. दो सांसदों द्वारा अधिकारियों को फटकार लगाने से लेकर ‘कामचोर’ कहने तक, ये विवाद अब साफ तौर पर खुलकर सामने आ रहा है.

राजनेताओं का मानना है कि यूपी में सिविल सेवकों का व्यवहार ‘अनियंत्रित’ हैं. वहीं सेवानिवृत्त और सेवारत अधिकारियों का कहना है कि ज्यादातर निर्णय मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) की मंजूरी के बाद लिए जाते हैं. लेकिन जनप्रतिनिधियों की तरह वे अपना पक्ष जनता के सामने नहीं रख सकते हैं.

कई रिटायर्ड सिविल सेवकों ने दिप्रिंट से बात की और इस बात पर सहमति जताई की कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में ‘सत्ता कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित है’. यही वजह है कि जनप्रतिनिधि ‘कहीं और अपना गुस्सा निकालने का विकल्प चुन रहे हैं.’

धीरे-धीरे धुंधला होता ‘प्राइड ऑफ प्रयागराज’

यूपी में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच हालिया विवाद उच्च शिक्षा विभाग के विशेष सचिव, आईएएस अधिकारी अखिलेश कुमार मिश्रा के पिछले महीने जारी किए गए एक आदेश को लेकर है. मिश्रा ने 30 दिसंबर के आदेश में उच्च शिक्षा निदेशालय को प्रयागराज से लखनऊ स्थानांतरित करने के लिए अधिकारियों से प्रस्ताव मांगा था.

इस आदेश की एक प्रति दिप्रिंट के पास है. इसमें लिखा है, ‘सरकारी काम में तेजी लाने के लिए उच्च शिक्षा निदेशालय को प्रयागराज से लखनऊ स्थानांतरित करने के लिए उच्च स्तर से निर्देश प्राप्त हुए हैं. इस संबंध में मुझे यह कहने का निर्देश दिया गया है कि एक स्पष्ट और विचारशील प्रस्ताव सरकार को तुरंत भेजा जाए.’

इस आदेश का निदेशालय के कर्मचारियों के संघ ‘शिक्षा निदेशालय मिनिस्टीरियल कर्मचारी संघ’ ने विरोध करना शुरू कर दिया. इसमें प्रयागराज क्षेत्र के पूर्व जनप्रतिनिधियों के अलावा मौजूदा सांसदों और विधायकों से भी मदद मांगी गई. उन्होंने आदित्यनाथ को पत्र लिखकर सरकार से ‘किसी भी कीमत पर’ निदेशालय को ट्रांसफर न किए जाने के लिए कहा गया.

भाजपा के सांसद विनोद सोनकर, प्रतापपुर से समाजवादी पार्टी के विधायक विजमा यादव, सपा एमएलसी डॉ मान सिंह यादव, अपना दल (एस) के विधायक वाचस्पति और भाजपा विधायक प्रवीण पटेल उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था.

प्रयागराज से एमएलसी रहे डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने 6 जनवरी को एक ट्वीट में कहा, ‘इस तथ्य के बावजूद कि उच्च शिक्षा विभाग का नेतृत्व साथी कैबिनेट मंत्री योगेंद्र उपाध्याय कर रहे हैं, यह निदेशालय लखनऊ में स्थानांतरित नहीं किया जाएगा. मौर्य ने आगे कहा, ‘ हमारा हमेशा से यह प्रयास रहा है कि एक नया कार्यालय (प्रयागराज में) आए और मौजूदा कार्यालय (यहां से) न जाए. आगे भी ऐसा ही प्रयास बना रहेगा. गलत आदेश जारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच की जाएगी.

मौर्य के ट्वीट में एक अटैचमेंट था. इसमें लिखा था- मिश्रा द्वारा जारी एक नए आदेश में कहा गया है कि पिछला आदेश एक संदेह की वजह से दिया गया था कि पूरे निदेशालय को लखनऊ में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया है. उन्होंने स्थिति को साफ करते हुए कहा कि प्रस्ताव सिर्फ ‘विचाराधीन’ था.

मौर्य के एक सहयोगी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि डिप्टी सीएम ने उच्च शिक्षा मंत्री उपाध्याय के साथ इस मुद्दे को उठाया था और इस कदम के बारे में अपनी चिंताओं से सीएम को अवगत कराया गया था. इसके बाद ही नया आदेश जारी किया गया.

एक अन्य यूपी भाजपा नेता ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, ‘सिराथू से विधानसभा चुनाव हारने के बाद मौर्य ने अपनी चमक खो दी है. वह अब अपनी उपस्थिति का एहसास कराते रहते हैं. उच्च शिक्षा निदेशालय का मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि मौर्य सिराथू से आते हैं. सिराथू प्रयागराज के पास कौशांबी में स्थित है. वह उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री नहीं हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने घोषणा की है कि क्षति नियंत्रण के रूप में गलत आदेश जारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू की जाएगी.’

दिप्रिंट ने फोन के जरिए उपाध्याय से बात करने की कोशिश की थी, लेकिन रिपोर्ट के प्रकाशित होने के समय तक उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. उनका जवाब मिलने के बाद रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

उधर निदेशालय कर्मचारियों के संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि विवादास्पद आदेश उन अधिकारियों के दिमाग की उपज है, जिन्होंने ‘लखनऊ में अपने घर बनाए हैं और वो अपने घरों से कार्यालय चलाना चाहते हैं’.

उन्होंने कहा, ‘इससे पहले पुलिस मुख्यालय को प्रयागराज से लखनऊ (2019 में) स्थानांतरित कर दिया गया था. 2009 में बेसिक शिक्षा निदेशालय को स्थानांतरित करने का प्रयास किया गया था और अब वे उच्च शिक्षा निदेशालय को स्थानांतरित करने की कोशिश कर रहे हैं.’

कौशांबी से भाजपा सांसद सोनकर ने 5 जनवरी को आदित्यनाथ को पत्र लिखा था. उन्होंने दिप्रिंट को बताया कि सरकार निश्चित रूप से मिश्रा के पहले के आदेश की जांच करेगी.

उन्होंने बताया, ‘मैंने एक पत्र लिखा था. निदेशालय प्रयागराज का शान है. इसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है, चाहे वह धार्मिक नजरिये से हो या फिर या प्रशासनिक नजरिये से. जिस तरह से यहां दफ्तरों को कहीं ओर शिफ्ट किया जा रहा है, प्रयागराज का गौरव धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है. एक जनप्रतिनिधि के रूप में मैंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि इसे स्थानांतरित नहीं किया जाए.’

‘बेईमान’ एसडीएम, ‘कामचोर’ अधिकारीउच्च शिक्षा निदेशालय के स्थानांतरण पर टकराव अकबरपुर के सांसद देवेंद्र सिंह उर्फ ‘भोले’ और कानपुर देहात में एक उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (एसडीएम) के बीच एक सार्वजनिक नौंक-झोंक के बाद हुआ.

एक व्यापारी बलवंत सिंह की 12-13 दिसंबर की दरम्यानी रात में पुलिस हिरासत में कथित रूप से मौत हो गई थी. इस घटना के परिणामस्वरूप एक स्टेशन हाउस अधिकारी (SHO) सहित 11 पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया गया, जिनमें से आठ को बाद में गिरफ्तार भी किया गया था.

व्यापारी के परिवार से मिलने के बाद भोले ने मैथा के स्थानांतरित हो चुके एसडीएम महेंद्र सिंह पर जमकर निशाना साधा था. सांसद ने कहा कि मुआवजे के रूप में जिस जमीन को परिवार को देने का वादा किया गया था, उसकी अभी तक पहचाना नहीं की गयी है.

भोले ने कैबिनेट मंत्री राकेश सचान और कानपुर देहात जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) नेहा जैन की उपस्थिति में अधिकारी से कहा. ‘आप (एसडीएम) बिना पैसे लिए कोई काम नहीं करते हैं. 24 घंटे बैठे रहते हैं. सारा सिस्टम बिगड़ा हुआ है. बेईमान लोग यहां बने रहते हैं… जो हर काम करने की लिए पैसा चाहते हैं. यही कारण है कि यह सब हो रहा है.’

दिप्रिंट ने अब अकबरपुर के एसडीएम महेंद्र सिंह से संपर्क किया था, लेकिन उनका नंबर पहुंच से बाहर आ रहा है. उनकी प्रतिक्रिया मिलने के बाद रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

इससे पहले भाजपा के कैसरगंज के सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने अक्टूबर में कम से कम 18 यूपी के जिलों में तबाही मचाने वाली बाढ़ के लिए कथित रूप से घटिया तैयारियों को लेकर आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार की आलोचना की थी. सिंह ने अपने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए राहत कार्यों की स्थिति की समीक्षा करते हुए संवाददाताओं से कहा था. ‘जनप्रतिनिधि चुप हैं. बाहर बोलने की अनुमति नहीं है. अगर आप बोलते हैं, तो आपको विद्रोही करार दिया जाएगा.’

सिंह के निर्वाचन क्षेत्र में गोंडा और बलरामपुर जिलों के बड़े हिस्से शामिल हैं. यह इलाके निचले बाढ़ प्रवण तराई क्षेत्र में स्थित हैं जो बाढ़ के कारण तबाह हो गए थे. कैसरगंज के सांसद के इस दावे के बाद कि जिले के अधिकारियों ने बाढ़ की व्यवस्था की समीक्षा नहीं की, गोंडा डीएम ने इस संबंध में किए गए कार्यों और बैठकों के बारे में एक बयान जारी किया था.

‘कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी का उल्लंघन’

दिप्रिंट ने जिन सेवानिवृत्त अधिकारियों से बात की, उन्होंने यूपी सरकार में सत्ता के केंद्रीकरण को राजनेताओं की चाल के पीछे एक संभावित कारण के रूप में उद्धृत किया.

भारत सरकार के पूर्व सचिव ई.ए.एस. सरमा के मुताबिक, ‘ यहां इसके तीन कारण हो सकते हैं. सबसे पहला कारण जनप्रतिनिधियों का नाराज होना है. जब नौकरशाह उनकी मांगों को नहीं सुनते हैं, तो उन्हें यह अपना अपमान लगता है. लेकिन यह वास्तविक कारण नहीं हो सकता है. दूसरा कारण यह है कि जब मुख्यमंत्री ज्यादा शक्तिशाली हो जाता हैं, तो उनके कनिष्ठ सहयोगी महसूस करने लगते हैं कि सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत का उल्लंघन हो रहा है.

सरमा ने आगे तर्क दिया कि जब मुख्यमंत्री के पास ज्यादा ताकत आ जाती है तो ‘कैबिनेट सहयोगी उनसे सीधे सवाल नहीं कर सकते हैं. संभव है ऐसे में वे अपना गुस्सा नौकरशाहों पर निकालने लगते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘सीएम सिर्फ एक वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगी होता है और लोकतंत्र में कैबिनेट की सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए. हालांकि जब ऐसा नहीं होता है, तो जुनियर मंत्री और जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का विकल्प चुनते हैं क्योंकि उन्हें जनता का सामना करना पड़ता है और चुनावों में नतीजे भुगतने पड़ते हैं.

40 सालों तक यूपी सरकार में सेवा देने वाले एक रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि मौजूदा समय में सत्ता वास्तव में ‘केंद्रीकृत’ है. एक ऐसा मॉडल जिसके अपने फायदे और नुकसान हैं.

उन्होंने कहा, ‘नौकरशाह आचार संहिता से बंधे होते हैं. और इसलिए वे जन प्रतिनिधियों की तरह सार्वजनिक रूप से सरकार के खिलाफ नहीं बोल सकते हैं. राज्य में ज्यादातर फैसले मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्री की मंजूरी से लिए जाते हैं. कई बार जनप्रतिनिधि नौकरशाहों से अनुचित मांग करते हैं जिसे एक ईमानदार अधिकारी पूरा करने में असमर्थ होता है. प्रत्येक मामले को केस-टू-केस आधार पर देखा जाना चाहिए. यह सच है कि वर्तमान में स्थिति केंद्रीकृत नियंत्रण के बारे में है.’


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