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क्या JDU-RJD सरकार में दरार? सहयोगी दलों के बीच ‘सत्ता हस्तांतरण’ को लेकर चल रहा है शीत युद्ध

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 बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन के सहयोगी दल जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) एक बार फिर से लड़ रहे हैं. इस बार लड़ाई गठबंधन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को सत्ता हस्तांतरण की संभावना को लेकर है.

मंगलवार को राजद विधायक विजय मंडल ने कहा, ‘हमें विश्वास है कि नीतीश कुमार अपनी प्रतिज्ञा का सम्मान करेंगे और मार्च में ही सत्ता तेजस्वी यादव को हस्तांतरित कर दी जाएगी. हमें 2025 (विधानसभा चुनाव) का इंतजार नहीं करना है.’ मंडल ने बिहार की राजधानी में मीडिया कर्मियों से बातचीत के दौरान कहा कि यह होली के बाद हो सकता है.

जदयू ने इसपर तत्काल प्रतिक्रिया दी.

उन्होंने कहा, ‘हमें इस तरह के बदलाव की जानकारी नहीं है. अगर आरजेडी विधायक की दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिए गए फैसलों तक पहुंच है, तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि फैसला कब किया गया था.’

राजद और जदयू के बीच ताजा विवाद सोमवार को जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष लल्लन सिंह द्वारा उपेंद्र कुशवाहा की आलोचना करते हुए दिए गए एक बयान से शुरू हुआ, जिन्होंने इस सप्ताह पार्टी छोड़ दी थी.

सिंह ने कहा कि जदयू ने 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने का कोई वादा नहीं किया था. उनके बयान ने पिछले साल सीएम नीतीश कुमार की सार्वजनिक घोषणा को लेकर राजद को झटका दिया कि तेजस्वी 2025 के चुनावों में महागठबंधन का नेतृत्व करेंगे, जिसे इस संकेत के रूप में देखा गया था कि अगर महागठबंधन जीतता है तो तेजस्वी बिहार के सीएम होंगे.

उन्होंने कहा, ‘मेरे बयान को तोड़ा-मरोड़ा गया है. मैंने कहा था कि 2025 में क्या होगा, इस पर 2025 में चर्चा की जाएगी, 2023 में नहीं.’

उन्होंने यह भी कहा कि जदयू का 2025 के चुनावों के बाद भी एक स्वतंत्र अस्तित्व होगा, जो जदयू और राजद के बीच विलय की बात को खत्म करने की ओर इशारा कर रहा है.


भ्रम पैदा करने वाला बयान

जदयू को कई और मुद्दे परेशान कर रहे हैं. कहा जाता है कि तेजस्वी को लेकर नीतीश कुमार के द्वारा की गई घोषणा जदयू के अधिकांश नेताओं को पसंद नहीं आई.

जदयू के राजद में विलय की अटकलों को भी मुख्यमंत्री को खारिज करना पड़ा. उपेंद्र कुशवाहा, पार्टी छोड़ने से पहले, बार-बार नीतीश से सत्ता हस्तांतरण पर राजद के साथ हुए ‘गुप्त सौदे’ का खुलासा करने के लिए कह रहे थे.

2022 के उपचुनावों के परिणाम से जदयू को अधिक चिंता हुई, जहां राजद ने मोकामा सीट को कम अंतर से बरकरार रखा. भाजपा गोपालगंज को बनाए रखने में कामयाब रही, भले ही उनकी पूर्व सहयोगी जदयू साथ नहीं थी, और उसने कुरहानी सीट भी जदयू से छीन लिया. यह इस बात की ओर इशारा करता है कि नीतीश के प्रमुख मतदाता उनका साथ छोड़ रहे हैं.

पिछले अगस्त में जब से नीतीश ने राजद से हाथ मिलाया है, तब से राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वह बिहार में तेजस्वी को सत्ता सौंपने के बाद वो अंततः राष्ट्रीय राजनीति के लिए दिल्ली का रुख करेंगे. लेकिन पिछले छह महीनों के दौरान, 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले विपक्ष के बीच एकता की अपील करने के अलावा नीतीश द्वारा राष्ट्रीय मंच पर बहुत कम सक्रिय देखा गया है.

2025 से पहले सत्ता हस्तांतरण के लिए राजद के भीतर बढ़ती मांग के साथ जदयू में संकट गहरा गया है.

नाम न छापने की शर्त पर जदयू के एक वरिष्ठ विधायक ने दिप्रिंट से कहा, ‘समय की मांग थी कि हम अपनी पार्टी को और दल बदल से बचाने के लिए नीतीश के बयान पर भ्रम पैदा करें और अपने वोट बैंक को भी बनाए रखें.’

शीत युद्ध

ललन सिंह के बयान के बाद दोनों सहयोगी दलों के बीच शीत युद्ध छिड़ गया है.

मंगलवार को राज्य में कृषि पर आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव एक घंटे से ज्यादा देरी से पहुंचे. उस समारोह में नीतीश कुमार राजद के कृषि मंत्री सर्वजीत कुमार के साथ बैठने के बजाय जदयू के मंत्री विजय चौधरी के साथ बैठे.

हाल के दिनों में, जदयू और राजद के बीच शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर द्वारा रामचरितमानस पर दिए गए बयानों और राजद विधायक सुधाकर सिंह द्वारा नीतीश के खिलाफ दिए गए बयानों पर सार्वजनिक रूप से विवाद हुआ है.

राजद के एक मंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, ‘ये सार्वजनिक झगड़े यह धारणा बनाते हैं कि महागठबंधन सरकार अस्थिर है. लेकिन हमें लगता है कि यह जदयू की दबाव की रणनीति है, जिसे लोकसभा चुनावों के लिए सीटों की संख्या पर हमारे साथ बातचीत करनी होगी.’

जबकि सहयोगियों के बीच एक चर्चा यह भी है कि नीतीश एक और यू-टर्न ले सकते हैं और भाजपा के साथ फिर से जुड़ सकते हैं, लेकिन बाद में वो ऐसी किसी भी संभावना से इनकार करते हैं.

जबकि बिहार विधानपरिषद के नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने कहा, ‘यह साफ कर दें कि नीतीश कुमार के लिए एनडीए के दरवाजे बंद हैं. वह हमेशा अपने सहयोगियों को किनारे रखते हैं जिसके कारण वह लंबे समय तक बिहार के सीएम बने रहे.’

 


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