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कर्नाटक में बीजेपी की खिसकने लगी दीवार तो पीएम मोदी से लेकर नड्डा तक को याद आए ‘येदियुरप्पा’

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भ्रष्टाचार, गुटबाजी और छवि की चिंता से जूझ रहे कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई को तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ रही है. बोम्मई सरकार की उपलब्धियों पर चुनाव लड़ने की बजाए, जातियों के ध्रुवीकरण का राजनीतिक कार्ड खेलने पर मजबूर हैं.

अपनी छवि व्यापक बनाने की कोशिशों के बीच बोम्मई के लिए जरूरी है कि वह येदियुरप्पा की नाराजगी को दूर करें और वह इस इस खेल में आरक्षण कार्ड से लिंगायत और प्रभावशाली वोकलिंगा समुदाय के बीच लिंगायतों के सबसे बड़े नेता येदियुरप्पा को अपने पक्ष में करें.

हालांकि, उदासीन येदियुरप्पा को चुनाव तक अच्छे मूड में रखने के लिए अब बीजेपी हाईकमान हर कोशिश करने को तैयार हैं.

मुख्यमंत्री बोम्मई को ताकीद की गई है कि उनके किसी प्रयास से येदियुरप्पा नाराज़ न हों इसका खास ख्याल रखा जाना चाहिए. साथ ही पार्टी ने उन्हें एक कदम आगे बढ़ते हुए पार्टी उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी और संगठन में उपाध्यक्ष बीएस विजेंद्र को चुनाव में येदियुरप्पा की सीट पर उतारने की हरी झंडी देने को भी कहा है. कर्नाटक की रिपोर्ट से चिंतित बीजेपी हाईकमान दक्षिण के राज्य बचाने के लिये हर संभव प्रयास करने को तैयार हैं जो उसे सरकार में वापस ला सके.

येदियुरप्पा को खुश रखना मजबूरी, सर्वे उत्साहजनक नहीं

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में अगर मोदी के भाषण के अलावा किसी बात की चर्चा हुई तो वह प्रधानमंत्री की येदियुरप्पा के साथ पंद्रह मिनट की अलग से मुलाकात थी. कर्नाटक बीजेपी नेता के मुताबिक यह मुलाकात उनकी विधानसभा शिकारीपुरा और उनके बड़े बेटे राधवेन्द्र के लोकसभा क्षेत्र शिमोगा में बने एयरपोर्ट के उद्घाटन के सिलसिले में पीएम मोदी के आने की सहमति के लिए थी.

येदियुरप्पा अपने 80 वें जन्मदिन 27 फरवरी से पहले एयरपोर्ट के उद्घाटन की इच्छा जता चुके हैं. पर केन्द्रीय नेता बताते हैं यह मुलाक़ात और बात केवल एयरपोर्ट के उद्घाटन के लिए नहीं थी बल्कि मुश्किलों में फंसी बीजेपी की गाड़ी को कर्नाटक में धक्का लगाने को लेकर अधिक थी. और पीएम येदियुरप्पा से ज़्यादा सहयोग की अपेक्षा रखते हुए उनकी नाराज़गी को दूर करने को लेकर थी.

हाल के दिनों में येदियुरप्पा न केवल अमित शाह की कर्नाटक यात्रा के दौरान बल्कि पीएम मोदी की विवेकानंद जयंती पर हुए कार्यक्रम में भी नदारद रहे थे. यहां तक कि दिसंबर में जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा राज्य बीजेपी के द्वारा निकाली गई यात्रा में शरीक होने के लिए कर्नाटक पहुंचे तब भी येदियुरप्पा को इसमें शामिल होने के लिए मनाना पड़ा था.

येदियुरप्पा कैंप का कहना था कि येदियुरप्पा को जे पी नड्डा के कार्यक्रम में आने का निमंत्रण ही नहीं दिया गया था. हालांकि, पिछले हफ़्ते बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा के उत्तर कर्नाटक से लिंगायतों के मठ से शुरू की गई विजय संकल्प यात्रा में नड्डा के साथ येदियुरप्पा मौजूद थे.

बीजेपी के कर्नाटक प्रभारी अरुण सिंह कहते हैं, ‘येदियुरप्पा और मुख्यमंत्री में काफ़ी बेहतर ट्यूनिंग है दोनों एक दूसरे का सम्मान करते हैं और येदियुरप्पा सबसे बड़े नेता है इसमें कोई शक नहीं है.’

बीजेपी के नेता दोनों नेताओं की कमेस्ट्री का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि ‘एक कार्यक्रम में येदियुरप्पा और मुख्यमंत्री बोम्मई दोनों थे, बोम्मई ने येदियुरप्पा से अनुरोध किया कि आप परियोजना का उद्घाटन करें पर येदियुरप्पा ने कहा, ‘नहीं’, अब आप मुख्यमंत्री है और इसका उद्घाटन मुख्यमंत्री को ही करना चाहिये.’

बीजेपी के हाथ पांव फूले हुए हैं

आरक्षण देकर जातियों को संतुष्ट करने की रणनीति के बाद राज्य में मचे बवंडर, सरकार पर भ्रष्टाचार का लेबल लगने और एंटी इनकमबैंसी की रिपोर्टें मिलने के बाद, बीजेपी हाईकमान के हाथ पांव फूल गए हैं. उन्हें ऐसा लग रहा है कि वो कर्नाटक गंवानें जा रहे हैं. इसलिए उन्होंने पार्टी के अंतिम ब्रह्मामस्त्र येदियुरप्पा की शरण में जाने का फैसला लिया है. इसी रिपोर्ट के आधार पर मुख्यमंत्री से हटाकर जलील किए जाने के बाद बीजेपी हाईकमान को उनके नाम पर वोट लेने के लिये उन्हें बीजेपी संसदीय बोर्ड में लिया गया. गुजरात में जीत के बाद उन्हें केन्द्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर विधायक दल की बैठक में अहमदाबाद भेजा गया, यह सब उन्हें सम्मान देने की बीजेपी हाईकमान की कोशिशें है.

बीजेपी के दूसरे केन्द्रीय नेता ने दिप्रिंट को बताया, ‘येदियुरप्पा इन कदमों से बहुत ज़्यादा खुश दिखाई नहीं होने जा रहे हैं. केन्द्रीय नेता के मुताबिक़ जो बीजेपी हाईकमान उनसे मांग रहा है उसकी तुलना में उन्हें उतनी राजनैतिक प्रतिनिधित्व दे नहीं रहा है. संसदीय बोर्ड में नामांकन तो महज़ प्रतीकात्मक है. उपाध्यक्ष जैसे पद येदियुरप्पा के लिए बेमानी है. प्रतीकात्मक केन्द्रीय राजनीति करने की उनकी कोई इच्छा नहीं है. लिंगायत विरासत को कर्नाटक की राजनीति में वह अपने बेटे को हस्तांतरित करना चाहते हैं जो असली समस्या है.’

बीजेपी हाईकमान की मुश्किलें दो तरफ़ा हैं. येदियुरप्पा के अलावा उनके पास कर्नाटक में लोकप्रिय जनाधार वाला नेता नहीं है. बोम्मई को येदियुरप्पा से अच्छी कमेस्ट्री और लिंगायत नेता होने के नाते मुख्यमंत्री बनाया गया पर बोम्मई का वो करिश्मा नहीं है. उसके ऊपर उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उनमें निर्णायक नेतृत्व की कमी ,अंदरूनी कलह ने सरकार की इमेज को भी बिगाड़ा है. बता दें कि हर दिन बीजेपी का कोई न कोई नेता अपने बयानों से सरकार की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. हिमाचल में हार के बाद दक्षिण के मात्र एक राज्य में शासन कर रही बीजेपी के लिए कर्णाटक की रिपोर्टें आशा के अनुरूप नहीं हैं.

केन्द्रीय बीजेपी के एक दूसरे नेता कहतें है, ‘कर्णाटक के शुरुआती सर्वे बिलकुल उत्साहजनक नहीं है, यह चिंतिंत करने वाला है.’ वह आगे कहते हैं, ‘येदियुरप्पा किसी क़ीमत पर नाराज़ न हों ,यह हमें सुनिश्चित करना है. एंटी इनकंबैंसी को कम करने के लिए जाति कार्ड खेलकर हमने सामाजिक समीकरण ठीक करने की कोशिश की है पर उसका कितना असर होगा यह कह पाना मुश्किल है. समय कम है और क्राइसिस मैनेजमेंट ज्यादा, पीएम मोदी को भी ज़्यादा ताक़त लगानी पड़ेगी.’

लिंगायत को बांधे रखना, दलितों आदिवासियों में सेंध

फिलहाल हाई कमान से लेकर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक येदियुरप्पा को पुचकारने की वजह महज लिंगायत वोट हैं. जो किसी भी क़ीमत पर बांधे रखने की रणनीति है. बीजेपी अध्यक्ष जो पी नड्डा की मठयात्रा भी बीजेपी की जमा पूंजी को सहेजने की रणनीति का हिस्सा मात्र ही है. बीजेपी की 9 दिनों की विजय संकल्प यात्रा जो उत्तर कर्णाटक में जन योगा सरमा से और दक्षिण कर्नाटक में टुमकुर से शुरू हुई है पार्टी की रणनीति को साफ़ दिखाता है. पर कांग्रेस के परंपरागत वोटबैंक को हासिल करने के लिए भी बीजेपी जी तोड़ मेहनत कर रही है. पीएम मोदी की बंजारा जनजाति को पट्टा देने के लिए पिछले गुरूवार को कर्नाटक की यात्रा करना उसी रणनीति का हिस्सा था. बंजारा समुदाय की हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र में अच्छी उपस्थिति है. जहां पीएम मोदी ने 52000 लोगों को पट्टा दिया है. वहीं विपक्ष के नेता सिद्धारमैया का बीजेपी पर हमला पार्टी की रणनीति की तरफ़ इशारा करता है. सिद्धरमैय्या ने कहा कि ‘मल्लिका अर्जुन खरगे जो अभी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं उन्होंने 1990 में राजस्व गांवों में वंचितों तक को पट्टा पर जमीन देने की प्रकिया की शुरुआत की थी, जिसे कांग्रेस सरकार ने अपने शासनकाल में बढ़ाया पर वो अपने कार्यकाल में पट्टा दे नहीं पाए थे, बीजेपी उनकी उगाई फसल को खाना चाहती है.’

वोकलिंगा में ज़्यादा हिस्सेदारी, जेडीएस पर हमला

बीजेपी नेताओं के मुताबिक़ 17 प्रतिशत लिंगायत वोट जो येदियुरप्पा के कारण बीजेपी के साथ रहा है और बीजेपी को दक्षिणी राज्य में सत्ता तक पहुंचाया है. वह बीजेपी से कमोबेश नहीं दूर होगा, बीजेपी को विश्वास है कि लिंगायतों में बड़े समूह पंचमसाली को भी चुनाव आते आते मना लिया जाएगा. पर बीजेपी को पुराने मैसूर और हैदराबाद कर्नाटक जहां चालीस सीटें हैं वहां अपनी सीटें बढ़ानी पड़ेंगी. जहां जेडीएस का दबदबा है. पुराने मैसूर के 64 सीटों में पार्टी 2018 के चुनाव में महज़ 13 सीटें पिछली बार जीत पाई थी. उसके बाद वोकलिंगा समुदाय को साधने के लिए बीजेपी ने केन्द्र से लेकर राज्य तक वोकलिंगा समुदाय के नेताओं को पार्टी में प्रतिनिधित्व दिया. 14 प्रतिशत की आबादी वाले जेडीएस की ताक़त माने जाने वाले समूह का समर्थन हासिल करने के लिए सात मंत्रियों को राज्य मंत्रिमंडल में जगह दी गई, केन्द्र में शोभा करंदलाजे को शामिल किया गया, केन्द्रीय बीजेपी की टीम में सीटी रवि को महासचिव बनाया गया और रणनीति के मुताबिक़ अमित शाह ने अपनी कर्नाटक यात्रा में जेडीएस नेता और पूर्व में बीजेपी के सहयोगी रह चुके कुमार स्वामी पर तीखे प्रहार किए.

बीजेपी नेताओं के मुताबिक़, ‘जेडीएस नेता पीएम मोदी और देवगौड़ा की नज़दीकी का हवाला देकर लिंगायतों और क़ुर्बां और अन्यसमूह का वोट मैसूर इलाक़े में पा जाते हैं और पर उलटे बीजेपी को वोकलिंगा उस इलाक़े में उस नज़दीकी के दुष्प्रचार के कारण मिलता ही नहीं, उसी गलती को अमित शाह ने जेडीएस पर हमला कर दुरुस्त करने की कोशिश की है दूसरा जेडीएस पर हमला कर शाह सत्ता मुक़ाबले को त्रिकोणीय बनाकर सत्ता विरोधी वोटों के बंटवारा की रणनीति देख रहे हैं.’

बीजेपी के कर्नाटक प्रभारी अरुण सिंह दिप्रिंट से कहतें है, ‘हमारी कोशिश मैसूर इलाक़े में अपना प्रदर्शन बेहतर करने की है और राज्य सरकार के दलितों के आरक्षण 15 से 17 प्रतिशत बढ़ाने और जनजाति समूह के आरक्षण को 3 से 7 प्रतिशत करने सेसामाजिक समूह के बीच ख़ुशी का माहौल बना है. कांग्रेस के मुख्यमंत्री और सरकार के खिलाफ कैंपेन में कोई दम नहीं है उल्टे मुख्यमंत्री पर हमला कर वह अपना नुक़सान कर रहे हैं.’

राज्य बीजेपी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष दिप्रिंट को कहते हैं, ‘यूपी में जैसे मायावती के कमजोर होने से दलितों का झुकाव बीजेपी की तरफ़ बढ़ा है उसी तरह देवगौडा के प्रति सम्मान दिखाते हुए कुमारस्वामी को भष्ट्र, दिखाने और वोकलिंगा नेताओं को पार्टी मेंप्र तिनिधित्व देने से उनका झुकाव हमारी तरफ़ बढ़ सकता है. पुराने मैसूर इलाक़े में कांग्रेस जेडीएस के बीच मुख्य मुक़ाबला होता रहा है. बीजेपी उस मुक़ाबले को त्रिकोणीय बनाने के लिये जेडीएस और कांग्रेस के वोकलिंगा नेताओं को टिकट देने के लिए हमारे दरवाज़े खुले हैं.’

लिंगायत और वोकलिंगा राज्य की जनसंख्या में 29 फ़ीसदी है. वर्तमान विधानसभा में अकेले दोनों समुदाय से 100 विधायक हैं. जिनमें 58 लिंगायत है और 42 वोकलिंगा, जिनमें 38 लिंगायत विधायक बीजेपी के हैं और 23 वोकलिंगा विधायक, जेडीएस के हैं. बीजेपी की रणनीति लिंगायत में बिखराव न होने देना, वोकलिंगा में बिखराव करना, दलितों का वोट आकर्षित करना, हिन्दुत्व के सहारे मुस्लिम बहुल ईलाकों में ध्रुवीकरण करने पर टिका है. पर सरकार की इमेज, पार्टी की गुटबाज़ी बीजेपी की रणनीति पर पानी फेर सकती है.

 


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